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Reflective essay sample

Essay on mrityudand

न्यायाधीश भी मनुष्य ही होते हैं, इसलिए उनकी अपनी सीमाएं होती हैं, यानी उनसे भी मानवीय भूल हो सकती है। इसलिए न्यायालयों को हमेशा अपने पूर्व निर्णयों की समीक्षा करते रहना चाहिए। न्याय के इसी दर्शन ने न्यायिक पुनर्व्याख्या के सिद्धांत को प्रतिस्थापित किया है। अगर तार्किक तौर पर देखें तो न्याय का यह सिद्धांत भी मृत्युदंड के खिलाफ खड़ा होता है। अगर किसी व्यक्ति को एक बार दोषी ठहरा कर फांसी के फंदे पर लटका दिया जाए और कुछ समय बाद अदालत को कुछ नए तथ्य हाथ लगें जिनसे यह साबित हो जाए कि उक्त व्यक्ति दोषी नहीं था, तो अदालत अपने पूर्व निर्णय को पलट नहीं सकती।अमेरिका के मैसाचुसेट्स के अटॉर्नी-जनरल ने साल1997 में कहा था, ऐसा कोई विश्वसनीय सुबूत नहीं है, जो यह साबित करे कि मौत की सजा हत्या के मामलों को कम करने में सहायक है। मौत की सजा न होने से मैसाचुसेट्स में हत्या की दर राष्ट्रीय औसत से करीब आधी हो गई थी। यह प्रवृत्ति सिर्फ मैसाचुसेट्स में ही नहीं दिखती है, बल्कि यही हाल अमेरिका के कई राज्यों का है।कनाडा की स्टडी :  कनाडा में साल 1976 में इस सजा को निरस्त कर दिया गया था। उसके बाद वहां पर हत्या की घटनाओं में कमी आई। साल 2000 में कनाडा में हत्या के 542 मामले आए, जो 1998 से 16 कम थे और 1975 के मुकाबले, यानी मौत की सजा के उन्मूलन के ठीक एक वर्ष पहले thee nunnery essay कम                           production line case study essay  source: livehindustan. jansattaDownload this article as PDF by sharing itThanks for sharing, PDF file ready to download nowSorry, in order to download PDF, you need to share it Share Download .

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1324 words, 10 pages